बजरी का नया विकल्प बना एम-सैंड - राजस्थान की सरकारी परियोजनाओं में उपयोग हुआ अनिवार्य
राजस्थान में नदियों से होने वाले बजरी खनन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच एम-सैंड विकल्प के रूप में तेजी से उभर रही है। भवन एवं अन्य निर्माण क्षेत्रों में इसके उपयोग में बढ़ोतरी से न सिर्फ नदियों पर दबाव घटा है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन में सुधार के संकेत भी मिलने लगे हैं।
निर्माण क्षेत्र में भी इसके उपयोग को बढ़ाने की कवायद चल रही है। सरकारी परियोजनाओं में वर्तमान में 25 फीसदी एम-सैंड का उपयोग अनिवार्य है, जिसे नई नीति में बढ़ाकर 50 फीसदी करने की तैयारी है।
राजस्थान में नदियों से होने वाले बजरी खनन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच एम-सैंड विकल्प के रूप में तेजी से उभर रही है। भवन एवं अन्य निर्माण क्षेत्रों में इसके उपयोग में बढ़ोतरी से न सिर्फ नदियों पर दबाव घटा है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन में सुधार के संकेत भी मिलने लगे हैं।
निर्माण क्षेत्र में भी इसके उपयोग को बढ़ाने की कवायद चल रही है। सरकारी परियोजनाओं में वर्तमान में 25 फीसदी एम-सैंड का उपयोग अनिवार्य है, जिसे नई नीति में बढ़ाकर 50 फीसदी करने की तैयारी है।
निर्माण क्षेत्र में भी इसके उपयोग को बढ़ाने की कवायद चल रही है। सरकारी परियोजनाओं में वर्तमान में 25 फीसदी एम-सैंड का उपयोग अनिवार्य है, जिसे नई नीति में बढ़ाकर 50 फीसदी करने की तैयारी है।
राजस्थान में नदियों से होने वाले बजरी खनन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच एम-सैंड विकल्प के रूप में तेजी से उभर रही है। भवन एवं अन्य निर्माण क्षेत्रों में इसके उपयोग में बढ़ोतरी से न सिर्फ नदियों पर दबाव घटा है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन में सुधार के संकेत भी मिलने लगे हैं।
निर्माण क्षेत्र में भी इसके उपयोग को बढ़ाने की कवायद चल रही है। सरकारी परियोजनाओं में वर्तमान में 25 फीसदी एम-सैंड का उपयोग अनिवार्य है, जिसे नई नीति में बढ़ाकर 50 फीसदी करने की तैयारी है।

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