कर्म-संस्कारों के अनुरूप ही मिलते हैं सुख-दु:ख-स्वामी धीरानंद
श्रीगंगानगर में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से संचालित कारागार सुधार परियोजना अंतरक्रांति के अन्तर्गत स्थानीय केन्द्रीय कारागार श्रीगंगानगर में दो दिवसीय आध्यात्मिक चिंतन एवं ध्यान आयोजन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी धीरानंद ने प्रवचनों में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सुख चाहता है लेकिन उसके कर्म संस्कारों के फलस्वरूप ही उसके जीवन में दु:ख बिना बुलाए ही आ जाते हैं जिससे वह हताश एवं निराश हो जाता है।
स्वामी जी ने बंदियों को जागरुक करते हुए कहा कि एक साधारण व्यक्ति के लिए सुख की प्राप्ति करना मृगतृष्णा के समान है क्योंकि वह आजीवन सुख के पीछे भागता है लेकिन उसके हाथ केवल दुख ही आता है क्योंकि जिसे आज हम सुख मान कर भोग रहे हैं वह सुख के पीछे छिपा हुआ दुख ही होता है।

No comments