क्या न्याय देंगे ऐसे भ्रष्टाचारी
कैलाश दिनोदिया
पुलिस थानों में दर्ज मुकदमे के जांच अधिकारी जब पीडि़त को न्याय नहीं देता, तो परिवादी उच्चाधिकारी की चौखट पर जाकर गुजारिश करके मुकदमे की जांच उच्चाधिकारी से करवाता है। वह समझता है कि जांच बदलवाने के बाद अब उसे न्याय मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं होता। नोखा के सीओ महमूद खां द्वारा 50 हजार रुपए की रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद स्पष्ट हो गया है कि जांच अधिकारी पीडि़त को न्याय दिलाने के बदले में भी रिश्वत की रकम लेते हैं।
जांच अधिकारी का न्याय और अन्याय से कोई ताल्लुक नहीं होता, वह उसके पक्ष में कार्रवाई करता है, जिस पक्ष की तरफ से रिश्वत की रकम जेब में आती है। मुकदमों में गिरफ्तारी से बचने के लिए तो अक्सर जांच अधिकारी आरोपी से रिश्वत लेकर उसे अभयदान देता है, यह तो अक्सर देखा गया है, लेकिन जिस परिवार की बेटी को ससुराल वालों ने दहेज के लिए मार दिया, उसी पीडि़त परिवार को न्याय देने के बदले में सीओ स्तर के अधिकारी रिश्वत लेते हैं।
ऐसे मामलों में पुलिस के चेहरे से नकाब उतार दिया है। बीकानेर एसीबी के हत्थे चढ़ा नोखा का सीओ महमूद खां ने तो मानवता की हदें ही पार कर दी। उसने दहेज हत्या के मुकदमे के आरोपियों में प्रत्येक आरोपी की गिरफ्तारी करने के बदले में रिश्वत की रकम तय की हुई थी। ऐसे जांच अधिकारी पीडि़त परिवार को क्या न्याय देंगे। पीडि़त परिवार जिस व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए रिश्वत की रकम दे देता, जांच अधिकारी केवल उसे ही गिरफ्तार करता। अगर पीडि़त रिश्वत नहीं देता, तो जांच अधिकारी आरोपियों को गिरफ्तार नहीं करता। यह कैसी तफ्तीश हुई।
अगर रिश्वत मिल जाती, तो मुल्जिम गिरफ्तार, वरना वह निर्दोष है। एसीबी समय-समय पर रिश्वत लेते पुलिस के अफसरों को दबोचती रही है, इसके बावजूद जांच अधिकारी रिश्वत लेना अपना अधिकार समझते हैं।
रिश्वत की मांग करने पर हर पीडि़त को एसीबी के दरबार में पहुंचना चाहिए, ताकि भ्रष्टाचारियों को जेल में डाला जाये। इसके लिए मजबूत हौंसले की दरकार है।
पुलिस थानों में दर्ज मुकदमे के जांच अधिकारी जब पीडि़त को न्याय नहीं देता, तो परिवादी उच्चाधिकारी की चौखट पर जाकर गुजारिश करके मुकदमे की जांच उच्चाधिकारी से करवाता है। वह समझता है कि जांच बदलवाने के बाद अब उसे न्याय मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं होता। नोखा के सीओ महमूद खां द्वारा 50 हजार रुपए की रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद स्पष्ट हो गया है कि जांच अधिकारी पीडि़त को न्याय दिलाने के बदले में भी रिश्वत की रकम लेते हैं।
जांच अधिकारी का न्याय और अन्याय से कोई ताल्लुक नहीं होता, वह उसके पक्ष में कार्रवाई करता है, जिस पक्ष की तरफ से रिश्वत की रकम जेब में आती है। मुकदमों में गिरफ्तारी से बचने के लिए तो अक्सर जांच अधिकारी आरोपी से रिश्वत लेकर उसे अभयदान देता है, यह तो अक्सर देखा गया है, लेकिन जिस परिवार की बेटी को ससुराल वालों ने दहेज के लिए मार दिया, उसी पीडि़त परिवार को न्याय देने के बदले में सीओ स्तर के अधिकारी रिश्वत लेते हैं।
ऐसे मामलों में पुलिस के चेहरे से नकाब उतार दिया है। बीकानेर एसीबी के हत्थे चढ़ा नोखा का सीओ महमूद खां ने तो मानवता की हदें ही पार कर दी। उसने दहेज हत्या के मुकदमे के आरोपियों में प्रत्येक आरोपी की गिरफ्तारी करने के बदले में रिश्वत की रकम तय की हुई थी। ऐसे जांच अधिकारी पीडि़त परिवार को क्या न्याय देंगे। पीडि़त परिवार जिस व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए रिश्वत की रकम दे देता, जांच अधिकारी केवल उसे ही गिरफ्तार करता। अगर पीडि़त रिश्वत नहीं देता, तो जांच अधिकारी आरोपियों को गिरफ्तार नहीं करता। यह कैसी तफ्तीश हुई।
अगर रिश्वत मिल जाती, तो मुल्जिम गिरफ्तार, वरना वह निर्दोष है। एसीबी समय-समय पर रिश्वत लेते पुलिस के अफसरों को दबोचती रही है, इसके बावजूद जांच अधिकारी रिश्वत लेना अपना अधिकार समझते हैं।
रिश्वत की मांग करने पर हर पीडि़त को एसीबी के दरबार में पहुंचना चाहिए, ताकि भ्रष्टाचारियों को जेल में डाला जाये। इसके लिए मजबूत हौंसले की दरकार है।
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