यह चुप्पी पाप है
कुछ इधर की कुछ उधर की
वर्ष 2019 का चुनाव एक कड़वाहट छोड़ गया। कुछ समय से एक दोषारोपण बार-बार चल रहा था कि किस पार्टी ने संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त किया है। चुनाव के आखिरी दौर में कांग्रेस के नेतृत्व में सभी राजनैतिक दलों ने मिलकर चुनाव आयोग पर ईवीएम में गड़बड़ी के माध्यम से बीजेपी के साथ पक्षपात करने का जो आरोप लगाया, वह बहुत ही बुरा था। लगभग 15 साल से ईवीएम उपयोग में है।
अनेक पार्टियां बार-बार हारी और जीती हैं और उसमें वे सब पार्टियां शामिल हैं, जो इसी ईवीएम के आधार पर अलग-अलग समय, अलग-अलग स्थानों पर चुनाव जीत कर आई हैं। तब उन परिणामों को स्वीकार करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई। आज जब उनको ऐसा लगने लगा कि शायद वे हार के कगार पर हैं, तो एक तरफ ईवीएम और दूसरी तरफ चुनाव आयोग को दोष देना प्रारंभ कर दिया। पहले वे सुप्रीम कोर्ट में गए, कोर्ट ने उनकी बात में कोई तथ्य नहीं पाया और उनकी प्रार्थना अस्वीकार हो गई। फिर सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने रिव्यू पेटिशन लगाई, वह भी रिजेक्ट हो गई।
हम खुद ही तो कोर्ट में जाते हैं, यह मानते हुए कि कोर्ट जो बात कहेगा वह निष्पक्ष होगी और हम उसका आदर करेंगे, और हम खुद ही कोर्ट के निर्णय को अस्वीकार कर देते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था और लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ को दरकिनार करके, उसके निर्णय को अस्वीकार कर, यदि हम अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, तो संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट नहीं तो और क्या कर रहे है? फिर जब हम चुनाव आयोग के पास जाते हैं, तो कोई भी एक तर्क नहीं दे पाते हैं कि उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी का कोई भी आधार क्यों नजर आता है, लेकिन हम खून खराबे और देश में अराजकता तक की धमकी दे देते हैं।
एक राजनेता तो यहां तक कह देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट भी इलेक्शन कमीशन के साथ सत्ता पक्ष से मिला हुआ है। पूरे दिन टीवी चैनलों पर इस विषय पर डिबेट चलती है। बड़े-बड़े एक्सपर्ट आते हैं। यहां तक कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त भी स्टेटमेंट देते हैं। बाल की खाल निकालने की कोशिश की जाती है कि ईवीएम में किस तरह की खराबी है और उसमें कैसे गड़बड़ी हो सकती है।
सबसे बुरा क्षण तो तब आया जब मतगणना से एक दिन पूर्व भारत रत्न और देश के पूर्व राष्ट्रपति जिनके बारे में यह कहा जाना चाहिए कि वे अब दलगत राजनीति से ऊपर उठ चुके हैं, वे एक दिन पहले तो चुनाव आयोग की प्रशंसा करते हैं और दूसरे दिन ईवीएम में गड़बड़ी की आशंकाओं पर अपनी चिंता जाहिर करते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसका राजनीति का पूरे जीवन का अनुभव है, जो विद्वान माना जाता है, जो सरकार में उच्चतम पदों पर रहने के बाद बहुत बार प्रधानमंत्री पद का दावेदार रहा और अंतत: राष्ट्रपति पद तक पहुंचा। जिसे सरकार ने भारत रत्न से नवाजा, वह यह कहता है तो दिल को ठेस पहुंचती है।
अगले दिन जब वोटों की गिनती होती है, वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल ( वीवीपैट ) में एक भी गड़बड़ी नहीं पाई गई। कहीं गलती नहीं पाई गई। और देखिए सारे टीवी चैनल, सारे अखबार चुप, कोई डिबेट नहीं, कहीं कोई चर्चा नहीं। जैसे यह विषय कभी था ही नहीं।
मेरा प्रश्न यह है कि, क्या इतने बड़े-बड़े राजनैतिक दल और उनके इतने बड़े-बड़े राजनैतिक नेता, पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न से नवाजे गए स्टेट्समैन, इस प्रकार असमंजस फैलाकर देश को गुमराह कर ऐसे ही छूट कर जा सकते हैं? क्या मीडिया का, टीवी चैनल्स का, देश की जनता का, यह पूछने का अधिकार नहीं है कि आप जवाब दीजिए, यह प्रश्न आपने क्यों उठाया था? हम सब इस पर चुप क्यों हो जाते हैं? हम इन राजनेताओं का, जिन्हें इस बात का बिल्कुल भी भय नहीं है, कि जो आज हम कह रहे हैं और कर रहे हैं, उनकी कल कोई जवाबदारी भी है। उनसे पलटकर क्यों नहीं पूछते, उनकी जवाबदारी क्यों नहीं तय करते कि कल किस आधार पर आपने पूरे देश में इस तरह संशय का वातावरण पैदा किया था। क्यों सारे टीवी चैनल्स इस विषय को भुला देते हैं?
मैं समझता हूं कि इस विषय को ऐसे ही बंद कर देना हमारा देश के प्रति, देश की जनता के प्रति अन्याय होगा। शरद पवार जैसे नेता, जो कि स्वयं एक बार प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे हैं, और जो एक तरफ तो कहते हैं कि यदि उनकी बेटी हार जाती है तो इसका मतलब ईवीएम में गड़बड़ी है और जब उनकी बेटी जीत जाती है, तो वह कहते हैं कि अब ईवीएम का प्रश्न प्रासंगिक नहीं रहा। तो यदि यह प्रश्न प्रासंगिक ही नहीं है, तो टीवी चैनल इन सब के ऊपर क्यों डिबेट करते हैं? क्या मीडिया का जनता के प्रति कोई भी दायित्व नहीं है?
मैं एक बार के लिए स्वीकार कर लेता हूं, कि राजनैतिक दल अपने स्वार्थों में देश और और जनता के हित की बात भूल चुके हैं परंतु क्या मीडिया भी अपने आप को उसी श्रेणी में रखना चाहता है? क्या वह कोई भी दायित्व को स्वीकार नहीं करना चाहता?
मैं चाहूंगा कि यह डिबेट चलती रहे। तब तक, जब तक ये स्टेट्समैन और ये बड़ी-बड़ी राजनैतिक पार्टियां और उनके नेता मुंह छुपाने के लिए बाध्य नहीं हो जाएं।
-केसी जैन
आईआरएस , नई दिल्ली
वर्ष 2019 का चुनाव एक कड़वाहट छोड़ गया। कुछ समय से एक दोषारोपण बार-बार चल रहा था कि किस पार्टी ने संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त किया है। चुनाव के आखिरी दौर में कांग्रेस के नेतृत्व में सभी राजनैतिक दलों ने मिलकर चुनाव आयोग पर ईवीएम में गड़बड़ी के माध्यम से बीजेपी के साथ पक्षपात करने का जो आरोप लगाया, वह बहुत ही बुरा था। लगभग 15 साल से ईवीएम उपयोग में है।
अनेक पार्टियां बार-बार हारी और जीती हैं और उसमें वे सब पार्टियां शामिल हैं, जो इसी ईवीएम के आधार पर अलग-अलग समय, अलग-अलग स्थानों पर चुनाव जीत कर आई हैं। तब उन परिणामों को स्वीकार करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई। आज जब उनको ऐसा लगने लगा कि शायद वे हार के कगार पर हैं, तो एक तरफ ईवीएम और दूसरी तरफ चुनाव आयोग को दोष देना प्रारंभ कर दिया। पहले वे सुप्रीम कोर्ट में गए, कोर्ट ने उनकी बात में कोई तथ्य नहीं पाया और उनकी प्रार्थना अस्वीकार हो गई। फिर सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने रिव्यू पेटिशन लगाई, वह भी रिजेक्ट हो गई।
हम खुद ही तो कोर्ट में जाते हैं, यह मानते हुए कि कोर्ट जो बात कहेगा वह निष्पक्ष होगी और हम उसका आदर करेंगे, और हम खुद ही कोर्ट के निर्णय को अस्वीकार कर देते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था और लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ को दरकिनार करके, उसके निर्णय को अस्वीकार कर, यदि हम अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, तो संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट नहीं तो और क्या कर रहे है? फिर जब हम चुनाव आयोग के पास जाते हैं, तो कोई भी एक तर्क नहीं दे पाते हैं कि उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी का कोई भी आधार क्यों नजर आता है, लेकिन हम खून खराबे और देश में अराजकता तक की धमकी दे देते हैं।
एक राजनेता तो यहां तक कह देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट भी इलेक्शन कमीशन के साथ सत्ता पक्ष से मिला हुआ है। पूरे दिन टीवी चैनलों पर इस विषय पर डिबेट चलती है। बड़े-बड़े एक्सपर्ट आते हैं। यहां तक कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त भी स्टेटमेंट देते हैं। बाल की खाल निकालने की कोशिश की जाती है कि ईवीएम में किस तरह की खराबी है और उसमें कैसे गड़बड़ी हो सकती है।
सबसे बुरा क्षण तो तब आया जब मतगणना से एक दिन पूर्व भारत रत्न और देश के पूर्व राष्ट्रपति जिनके बारे में यह कहा जाना चाहिए कि वे अब दलगत राजनीति से ऊपर उठ चुके हैं, वे एक दिन पहले तो चुनाव आयोग की प्रशंसा करते हैं और दूसरे दिन ईवीएम में गड़बड़ी की आशंकाओं पर अपनी चिंता जाहिर करते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसका राजनीति का पूरे जीवन का अनुभव है, जो विद्वान माना जाता है, जो सरकार में उच्चतम पदों पर रहने के बाद बहुत बार प्रधानमंत्री पद का दावेदार रहा और अंतत: राष्ट्रपति पद तक पहुंचा। जिसे सरकार ने भारत रत्न से नवाजा, वह यह कहता है तो दिल को ठेस पहुंचती है।
अगले दिन जब वोटों की गिनती होती है, वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल ( वीवीपैट ) में एक भी गड़बड़ी नहीं पाई गई। कहीं गलती नहीं पाई गई। और देखिए सारे टीवी चैनल, सारे अखबार चुप, कोई डिबेट नहीं, कहीं कोई चर्चा नहीं। जैसे यह विषय कभी था ही नहीं।
मेरा प्रश्न यह है कि, क्या इतने बड़े-बड़े राजनैतिक दल और उनके इतने बड़े-बड़े राजनैतिक नेता, पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न से नवाजे गए स्टेट्समैन, इस प्रकार असमंजस फैलाकर देश को गुमराह कर ऐसे ही छूट कर जा सकते हैं? क्या मीडिया का, टीवी चैनल्स का, देश की जनता का, यह पूछने का अधिकार नहीं है कि आप जवाब दीजिए, यह प्रश्न आपने क्यों उठाया था? हम सब इस पर चुप क्यों हो जाते हैं? हम इन राजनेताओं का, जिन्हें इस बात का बिल्कुल भी भय नहीं है, कि जो आज हम कह रहे हैं और कर रहे हैं, उनकी कल कोई जवाबदारी भी है। उनसे पलटकर क्यों नहीं पूछते, उनकी जवाबदारी क्यों नहीं तय करते कि कल किस आधार पर आपने पूरे देश में इस तरह संशय का वातावरण पैदा किया था। क्यों सारे टीवी चैनल्स इस विषय को भुला देते हैं?
मैं समझता हूं कि इस विषय को ऐसे ही बंद कर देना हमारा देश के प्रति, देश की जनता के प्रति अन्याय होगा। शरद पवार जैसे नेता, जो कि स्वयं एक बार प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे हैं, और जो एक तरफ तो कहते हैं कि यदि उनकी बेटी हार जाती है तो इसका मतलब ईवीएम में गड़बड़ी है और जब उनकी बेटी जीत जाती है, तो वह कहते हैं कि अब ईवीएम का प्रश्न प्रासंगिक नहीं रहा। तो यदि यह प्रश्न प्रासंगिक ही नहीं है, तो टीवी चैनल इन सब के ऊपर क्यों डिबेट करते हैं? क्या मीडिया का जनता के प्रति कोई भी दायित्व नहीं है?
मैं एक बार के लिए स्वीकार कर लेता हूं, कि राजनैतिक दल अपने स्वार्थों में देश और और जनता के हित की बात भूल चुके हैं परंतु क्या मीडिया भी अपने आप को उसी श्रेणी में रखना चाहता है? क्या वह कोई भी दायित्व को स्वीकार नहीं करना चाहता?
मैं चाहूंगा कि यह डिबेट चलती रहे। तब तक, जब तक ये स्टेट्समैन और ये बड़ी-बड़ी राजनैतिक पार्टियां और उनके नेता मुंह छुपाने के लिए बाध्य नहीं हो जाएं।
-केसी जैन
आईआरएस , नई दिल्ली
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