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मासूम बच्चों को केवल आग ही नहीं जलाती!

वर्तमान शिक्षण व्यवस्था एवं शिक्षा में दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मेें जहां 'अंक बुद्धिमता का एकमात्र पैमाना हैं एवं सूचनाएं ज्ञान का एक मात्र आधार हैं, जहां अगर मछली पेड़ पर न चढ़ पाये तो उसे फेल घोषित कर दिया जाता है और अपनी मासूमियत अपने आनन्द और अपनी स्वच्छन्दता को बेचकर अंकों की दौड़ में आगे निकल जाये तो उसे पास घोषित कर दिया जाता है।
हाल ही में कुछ-कुछ दिनों के अन्तराल से सम्पूर्ण देश में अलग-अलग राज्यों के एवं सीबीएसई के परीक्षा परिणाम घोषित हुए। हर वर्ष की तरह जिन बच्चों ने अंकों की इस दौड़ में बाजी मारी, उन बच्चों को बड़े-बड़े इश्तिहारों में और अखबारों में स्थान मिले। भेड़चाल पर चलने वाले इस समाज ने ईष्र्यावश ही सही, पर उन सभी बच्चों को जिन्दगी में सफल घोषित कर दिया और यहां तक तो फिर भी ठीक था, परन्तु जो बच्चा इस अंक दौड़ में पीछे रह गया, उसे नालायक और असफल भी घोषित कर दिया गया।
मां-बाप भी अपने बच्चों को पड़ौस के टॉपर बच्चे का अखबार में छपा फोटो दिखा दिखाकर चाबी भरने की कोशिश करने लग गये कि अगले वर्ष हमें निराश मत कर देना। जिन स्कूलों नें ये रट्टू तोते पैदा किये थे और सूचनाओं को बच्चों के अन्दर ठंूसने में कामयाब हुए थे, उन्होंने अधिकारपूर्वक अपनी फीस बढ़ा दी। कुछ आत्महत्याएं भी हुई, बहुत सारे अवसादग्रस्त भी हुए, अनगिनत उलाहने भी मिले और फिर सभी बच्चे अपने मासूम मन पर इस समाज, अपने परिवार और पड़ौस वाले अंकल की नाजायज इच्छाओं को पूरा करने का बोझ लेकर चल पड़े।
इसी बीच सूरत की एक कोचिंग क्लास (कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि स्कूल शिक्षा की) में इन्हीं बोझ तले दबे बच्चों में जब सूचनाएं ठूंसी जा रही थी तो अचानक आग लग जाने से बच्चों के साथ-साथ समाज के नापाक इरादे और नाजायज उम्मीदें भी भस्म हो गईं। बाद में हर बार की तरह कभी इसका ठिकरा शहरी विभाग के सिर फोड़ा गया तो किसी ने बिजली विभाग को कसूरवार ठहराया। किसी ने फायर फाइटर को कोसा तो किसी ने वीडियो बना रहे लोगों को निर्लज कहा। क्या आप भी बाकी लोगों की तरह ऐसा ही सोचते हैं कि बच्चे आग से जले थे?
क्या आपको नहीं लगता कि मां-बाप की अपेक्षाएं और अपने सपनों को अपने बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कुत्सित इच्छा बच्चों को नहीं जलाती है? क्या इस समाज की अंकों के आधार पर किसी बच्चे के सफल या असफल हो जाने का फरमान सुनाने की गन्दी सोच बच्चे को नहीं जलाती है? सभी बच्चों को एक ही कसौटी पर तौलने की हमारी शिक्षण व्यवस्था की घटिया राजनीति नहीं जलाती है?
कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुए कोचिंग संस्थानों द्वारा बच्चे में कम्पीटिशन करने का नकारात्मक जहर भरने की रणनीति बच्चों को नहीं जलाती है? एक बच्चे की अनावश्यक एवं आधारहीन रूप से दूसरे से तुलना करना और फिर उसे नीचा दिखाने की सोच बच्चे को नहीं जलाती है? अंकों की दौड़ में क्षोभ एवं डर के बीच जिन्दगी को मात्र एवं मात्र संघर्ष के लिए बना लेने की आदत बच्चे को नहीं जलाती है? भारी बस्ते एवं उससे भी भारी मन के साथ सूचनाएं ठूंसने के लिए बांधी गई स्कूल एवं ट्यूशन की जंजीरे बच्चे को नहीं जलाती है? मुझे नहीं लगता कि केवल आग से ही बच्चे जलते हैं या केवल सूरत में ही बच्चे जले। आज हर घर में, हर समाज में, हर उम्र का बच्चा जल रहा है। तुम तुम्हारे अधूरे बिखरे सपनों का बोझ उन मासूमों पर लादते हो। तुम केवल और केवल अंकों को उसकी सफलता या विफलता का पैमाना बनाकर बैठे हो। बच्चे के पैदा होते ही, या उससे पहले भी, जब तुम ये निश्चित करने लगते हो कि उसे क्या बनाना है। ढाई वर्ष की उम्र में उसे स्कूल भेजकर रटवाने लगते हो, रिश्तेदारों के सामने जब वह तुम्हारी अपेक्षाओं के हिसाब से कविता/एबीसीडी नहीं सुना पाता तो तुम उसे कोसने लगते हो, तो बताओ बच्चा जलेगा या नहीं जलेगा?
हर वक्त तुलना, हर वक्त उम्मीदें, हर वक्त बोझ और हर वक्त डर। क्या तुमने सोचा है कि यह सब बच्चे की आत्मा को जला डालती है। क्यों नहीं सोचते तुम कि तुम्हारे बच्चे के बचपन (जो आजकल  बचा ही नहीं) को, वह किलकारी , मासूमियत, आनन्द, सच्चाई और वह स्वच्छन्दता किताबों के पन्नों और तुम्हारी अपेक्षाओं के मायाजाल में कैसे खो जाती है! इसीलिए मैं भारी हृदय से कह रहा हूं कि बच्चे केवल सूरत में ही नहीं जले, बच्चे हर घर में रोज जल रहे हैं।
मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं शिक्षा के खिलाफ कतई नहीं हूं परन्तु इस शिक्षण व्यवस्था के खिलाफ सौ प्रतिशत हूं। वर्तमान शिक्षण व्यवस्था एवं शिक्षा में दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मेें जहां 'अंकÓ बुद्धिमता का एकमात्र पैमाना हैं एवं सूचनाएं ज्ञान का एक मात्र आधार हैं, जहां अगर मछली पेड़ पर न चढ़ पाये तो उसे फेल घोषित कर दिया जाता है और अपनी मासूमियत अपने आनन्द और अपनी स्वच्छन्दता को बेचकर अंकों की दौड़ में आगे निकल जाये तो उसे पास घोषित कर दिया जाता है।
मैं यहां फिर स्पष्ट कर दंू कि मैं अंकों के खिलाफ भी नहीं हूं परन्तु अंकों को ही एकमात्र पैमाना मानने के सख्त खिलाफ हूं। सभी बच्चों को एक ही तराजू में तौलने के सख्त खिलाफ हूं और मैं सख्त खिलाफ हूं इस शिक्षण संस्था के जो हर बच्चे को ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा एवं क्षमता की पहचान करने में नितान्त असफल हुई है, जिसकी ठूंसी हुई सूचनाएं असल जीवन में कहीं भी और कभी भी काम नहीं आती हैं। जो एक जीते जागते और जीवन्त बच्चे को डर और तनाव से भरा रोबोट बना देती हैं।
सच में हमें गहराई में जाकर पुन: विचार करने की जरूरत है अन्यथा लार्ड मैकाले की क्लर्क तैयार करने की यह शिक्षा व्यवस्था बच्चों को इसी तरह से जलाती रहेगी और अंकों की दौड़ में बच्चा जिन्दगी हार जायेगा। क्यों न हम बच्चे को पहले पहचानें, फिर उससे अपेक्षाएं पालें। मान कर चलना, तब उसकी उड़ान आपकी अपेक्षाओं से कहीं ऊपर होगी।

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