सेप्टिक शॉक से पीडि़त महिला को मेदांता में मिला जीवनदान
- तीन दिन में रोगी को किया भलाचंगा
श्रीगंगानगर । सेप्टिक शॉक से पीडि़त एक महिला को मेदांता सुपर स्पैसिलिटी हॉस्पिटल में जीवनदान मिला है। 24 मई को जब लालगढ़ निवासी 55 वर्षीय महिला सुलोचना को मेदांता में लाया गया तो, उस वक्त उन्हें सांस लेने में मुश्किल हो रही थी। सेप्टिक शॉक के कारण ब्लडप्रैशर भी काफी कम था। मेदांता में पहुंचते ही यहां के चिकित्सकों ने रोगी को उचित उपचार देते हुए पांच दिन में पूरी तरह से ठीक कर छुट्टी दे दी गई।
कोर्डियोलोजिस्ट डॉ. हितेष यादव व एमडी डॉ. अरूण कालड़ा ने बताया कि सेप्सिस बीमारी के कारण कई बार रोगी को सेप्टिक शॉक हो जाता है। जिससे शरीर के टिश्यूज में इन्फेक्शन फैल जाता है। इन्फेक्शन से लड़ते हुए शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान होने लगता है। अगर इन्फेक्शन कंट्रोल नहीं किया गया, तो यह और गंभीर हो जाता है, इस स्टेज को सेप्टिक शॉक कहते हैं। इससे किडनी, लंग, फेफड़ों और दिमाग पर इसका असर होने लगता है। इसमें कई बार रोगी की जान भी चली जाती है।
मेदांता के डॉक्टरों ने बताया कि सुलोचना देवी को अस्पताल में भर्ती करते ही तीन दिन तक कृत्रिम रूप से सांस दी गई। ब्लड प्रैशर बढ़ाने वाले इंजेक्शन लगाए गए और लाइफ स्पोट सिस्टम पर रखा गया। लगातार विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उपचार के चलते सुलोचना देवी पुरी तरह से ठीक हो गई। दो दिन और चिकित्सकों की देखरेख में रखने के बाद आज उन्हें घर जाने के लिए छुट्टी दे दी गई।
श्रीगंगानगर । सेप्टिक शॉक से पीडि़त एक महिला को मेदांता सुपर स्पैसिलिटी हॉस्पिटल में जीवनदान मिला है। 24 मई को जब लालगढ़ निवासी 55 वर्षीय महिला सुलोचना को मेदांता में लाया गया तो, उस वक्त उन्हें सांस लेने में मुश्किल हो रही थी। सेप्टिक शॉक के कारण ब्लडप्रैशर भी काफी कम था। मेदांता में पहुंचते ही यहां के चिकित्सकों ने रोगी को उचित उपचार देते हुए पांच दिन में पूरी तरह से ठीक कर छुट्टी दे दी गई।
कोर्डियोलोजिस्ट डॉ. हितेष यादव व एमडी डॉ. अरूण कालड़ा ने बताया कि सेप्सिस बीमारी के कारण कई बार रोगी को सेप्टिक शॉक हो जाता है। जिससे शरीर के टिश्यूज में इन्फेक्शन फैल जाता है। इन्फेक्शन से लड़ते हुए शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान होने लगता है। अगर इन्फेक्शन कंट्रोल नहीं किया गया, तो यह और गंभीर हो जाता है, इस स्टेज को सेप्टिक शॉक कहते हैं। इससे किडनी, लंग, फेफड़ों और दिमाग पर इसका असर होने लगता है। इसमें कई बार रोगी की जान भी चली जाती है।
मेदांता के डॉक्टरों ने बताया कि सुलोचना देवी को अस्पताल में भर्ती करते ही तीन दिन तक कृत्रिम रूप से सांस दी गई। ब्लड प्रैशर बढ़ाने वाले इंजेक्शन लगाए गए और लाइफ स्पोट सिस्टम पर रखा गया। लगातार विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उपचार के चलते सुलोचना देवी पुरी तरह से ठीक हो गई। दो दिन और चिकित्सकों की देखरेख में रखने के बाद आज उन्हें घर जाने के लिए छुट्टी दे दी गई।

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