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परंपरा पर आधुनिकता भारी


भीषण गर्मी के बावजूद श्रीगंगानगर शहर में मिट्टी के मटकों की मांग पहले की तुलना में लगातार घटती जा रही है। कभी हर घर की जरूरत माने जाने वाले मिट्टी के मटके अब आधुनिक जीवनशैली और फ्रिज संस्कृति के बीच अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मिट्टी के मटके केवल पानी ठंडा रखने का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक कुम्भकार कला की पहचान भी हैं।
शहर और आसपास के कई कुम्भकार परिवार आज भी मिट्टी के मटके, हांडी, तंदूर और अन्य पारंपरिक बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। कारीगर महीनों की मेहनत से अलग-अलग डिजाइनों और आकारों के मटके तैयार करते हैं।

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