शाम फिर क्यूं उदास है दोस्त, तू कहीं आस-पास है दोस्त...
- मोहम्मद रफी को चाहने वालों में श्रीगंगानगर के कपिल की विशिष्ट पहचान
- दिलों पर राज करने वाले के परिजनों ने मुम्बई में कालड़ा को दिल में बसाया
श्रीगंगानगर। शाम फिर क्यूं उदास है दोस्त, तू कहीं आस-पास है दोस्त...यही वो गाना था जो सुरों के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने अपनी मौत से कुछ घंटे पहले रिकॉर्ड किया था। दस हजार से अधिक गानों और अपनी इंसानियत से दिलों पर अमिट छाप छोडऩे वाले रफी आखिरी गाने की पंक्तियों की तरह हमेशा दोस्त की तरह आस-पास रहेंगे और याद किए जाते रहेंगे।
देश-विदेश की 29 भाषाओं में गाने वाले, पद्मश्री से सम्मानित रफी के प्रशंसक दुनिया के कोने-कोने में हैं लेकिन इनमें श्रीगंगानगर के लगभग 40 वर्षीय कपिल कालड़ा की विशिष्ट पहचान है। कुछ समय पहले कालड़ा मुम्बई के बांद्रा में 'रफी मेन्शनÓ पहुंचे तो रफी के दामाद परवेज अहमद और पुत्री यास्मीन ने गर्मजोशी से न केवल स्वागत किया, अपने एक कार्यक्रम में मंच पर अतिथि के रूप में सम्मान दिया। रफी की स्मृति में होने वाले कार्यक्रम में श्रीगंगानगर आने का भरोसा भी दिलाया।
कालड़ा एक स्कूल के संगीत शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया। माता और पत्नी का विशेष सहयोग रहता है। दो पुत्रियां हैं, भूमिका तो गाती भी है। उनके अनुसार सभी के स्नेह की बदौलत ही वे यह सिलसिला जारी रखना चाहते हैं। वे बताते हैं कि रफी गायक तो बेजोड़ थे ही, 'नर सेवा-नारायण सेवाÓ की मिसाल भी थे। जरूरतमंदों की मदद बढ़-चढ़ कर करते थे।
सम्बोधन ही बन गया 'जय रफी साहबÓ
कालड़ा रफी के ऐसे दीवाने हैं कि 'जय रफी साहबÓ सम्बोधन बना लिया, अब तो उन जैसे कितने ही चाहने वाले ऐसा बोलने लगे हैं। उन्होंने अपने हाथ पर भी यह शब्द गुदवा रखा है। अपनी मोटरसाइकिल और कार पर इसे लिख रखा है। कार में और जहां जगह मिलती है, हर जगह रफी के चित्र लगा रखे हैं। सुमेश शर्मा सहित कुछ साथियों के साथ मिल कर उन्होंने 'द रफियन्सÓ नाम से टीम भी बनाई है। खुद को 'रफी साहब के सेवकÓ मानते हैं और ऐसा बैनर पर लिखते भी हैं।
हर माह 24 को सेवा कार्य
रफी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को हुआ था, इसलिए प्रत्येक माह की 24 तारीख को सांकेतिक रूप से जन्मदिन मनाते हुए सेवा कार्य किया जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को उनकी पसंद का खाना खिलाया जाता है। मई 2017 में 'द रफियन्सÓ ने पहला कार्यक्रम जैन पब्लिक स्कूल में रखा। दिसम्बर, 2018 में प्रत्येक रविवार को सार्वजनिक स्थल पर सुरों की महफिल सजाई और रफी के तराने पेश किए।
वह दिन रहेगा याद
कालड़ा बताते हैं कि उन्होंने रफी के पैतृक गांव पंजाब के कोटला सुल्तानसिंह में संगीत का कार्यक्रम रखा। सत्रह जनों की टीम गई। वह दिन सदा याद रहेगा। गांव वालों ने खूब उत्साह दिखाया और बताया कि अधिकती लोग तो सिर्फ फोटो खिंचवाने आते हैं। 'द रफियन्सÓ के सभी कार्यक्रमों को फेस बुक के माध्यम से लाइव किया जाता है। कई संस्थाओं ने टीम को सम्मानित किया है। पाकिस्तान सहित दुनिया के कोने-कोने में रफी के चाहने वाले हजारों जने इनके कार्यक्रम देखते हैं और लाइक करते हैं।
27 को 'तुझको पुकारे मेरे गीतÓ
रफी की 39 वीं पुण्यतिथि 31 जुलाई को है। संस्था ने 27 जुलाई को संगीतमयी शाम 'तुझको पुकारे मेरे गीतÓ इन्दिरा वाटिका में शाम 7.47 बजे रखी है। 'द रफियन्सÓ की एक विशेषता यह भी है कि तय समय पर कार्यक्रम शुरू किया जाता है और सबसे पहले माता की आराधना में गीत प्रस्तुत किया जाता है। कालड़ा पूरा श्रेय टीम को देते हैं। उनके साथ वासुदेव शर्मा, योगेश्वर, हिमांशु, हर्ष जुनेजा, जितेंद्र अरोड़ा, लविश चुघ, शशिकांत वर्मा, राहुल गुप्ता, शिवानी चुघ आदि जुड़े हुए हैं। सुमेश शर्मा, राजीव खेतान, प्रेम चुघ सहित अनेक लोग सहयोग करते हैं।
- दिलों पर राज करने वाले के परिजनों ने मुम्बई में कालड़ा को दिल में बसाया
श्रीगंगानगर। शाम फिर क्यूं उदास है दोस्त, तू कहीं आस-पास है दोस्त...यही वो गाना था जो सुरों के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने अपनी मौत से कुछ घंटे पहले रिकॉर्ड किया था। दस हजार से अधिक गानों और अपनी इंसानियत से दिलों पर अमिट छाप छोडऩे वाले रफी आखिरी गाने की पंक्तियों की तरह हमेशा दोस्त की तरह आस-पास रहेंगे और याद किए जाते रहेंगे।
देश-विदेश की 29 भाषाओं में गाने वाले, पद्मश्री से सम्मानित रफी के प्रशंसक दुनिया के कोने-कोने में हैं लेकिन इनमें श्रीगंगानगर के लगभग 40 वर्षीय कपिल कालड़ा की विशिष्ट पहचान है। कुछ समय पहले कालड़ा मुम्बई के बांद्रा में 'रफी मेन्शनÓ पहुंचे तो रफी के दामाद परवेज अहमद और पुत्री यास्मीन ने गर्मजोशी से न केवल स्वागत किया, अपने एक कार्यक्रम में मंच पर अतिथि के रूप में सम्मान दिया। रफी की स्मृति में होने वाले कार्यक्रम में श्रीगंगानगर आने का भरोसा भी दिलाया।
कालड़ा एक स्कूल के संगीत शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया। माता और पत्नी का विशेष सहयोग रहता है। दो पुत्रियां हैं, भूमिका तो गाती भी है। उनके अनुसार सभी के स्नेह की बदौलत ही वे यह सिलसिला जारी रखना चाहते हैं। वे बताते हैं कि रफी गायक तो बेजोड़ थे ही, 'नर सेवा-नारायण सेवाÓ की मिसाल भी थे। जरूरतमंदों की मदद बढ़-चढ़ कर करते थे।
सम्बोधन ही बन गया 'जय रफी साहबÓ
कालड़ा रफी के ऐसे दीवाने हैं कि 'जय रफी साहबÓ सम्बोधन बना लिया, अब तो उन जैसे कितने ही चाहने वाले ऐसा बोलने लगे हैं। उन्होंने अपने हाथ पर भी यह शब्द गुदवा रखा है। अपनी मोटरसाइकिल और कार पर इसे लिख रखा है। कार में और जहां जगह मिलती है, हर जगह रफी के चित्र लगा रखे हैं। सुमेश शर्मा सहित कुछ साथियों के साथ मिल कर उन्होंने 'द रफियन्सÓ नाम से टीम भी बनाई है। खुद को 'रफी साहब के सेवकÓ मानते हैं और ऐसा बैनर पर लिखते भी हैं।
हर माह 24 को सेवा कार्य
रफी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को हुआ था, इसलिए प्रत्येक माह की 24 तारीख को सांकेतिक रूप से जन्मदिन मनाते हुए सेवा कार्य किया जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को उनकी पसंद का खाना खिलाया जाता है। मई 2017 में 'द रफियन्सÓ ने पहला कार्यक्रम जैन पब्लिक स्कूल में रखा। दिसम्बर, 2018 में प्रत्येक रविवार को सार्वजनिक स्थल पर सुरों की महफिल सजाई और रफी के तराने पेश किए।
वह दिन रहेगा याद
कालड़ा बताते हैं कि उन्होंने रफी के पैतृक गांव पंजाब के कोटला सुल्तानसिंह में संगीत का कार्यक्रम रखा। सत्रह जनों की टीम गई। वह दिन सदा याद रहेगा। गांव वालों ने खूब उत्साह दिखाया और बताया कि अधिकती लोग तो सिर्फ फोटो खिंचवाने आते हैं। 'द रफियन्सÓ के सभी कार्यक्रमों को फेस बुक के माध्यम से लाइव किया जाता है। कई संस्थाओं ने टीम को सम्मानित किया है। पाकिस्तान सहित दुनिया के कोने-कोने में रफी के चाहने वाले हजारों जने इनके कार्यक्रम देखते हैं और लाइक करते हैं।
27 को 'तुझको पुकारे मेरे गीतÓ
रफी की 39 वीं पुण्यतिथि 31 जुलाई को है। संस्था ने 27 जुलाई को संगीतमयी शाम 'तुझको पुकारे मेरे गीतÓ इन्दिरा वाटिका में शाम 7.47 बजे रखी है। 'द रफियन्सÓ की एक विशेषता यह भी है कि तय समय पर कार्यक्रम शुरू किया जाता है और सबसे पहले माता की आराधना में गीत प्रस्तुत किया जाता है। कालड़ा पूरा श्रेय टीम को देते हैं। उनके साथ वासुदेव शर्मा, योगेश्वर, हिमांशु, हर्ष जुनेजा, जितेंद्र अरोड़ा, लविश चुघ, शशिकांत वर्मा, राहुल गुप्ता, शिवानी चुघ आदि जुड़े हुए हैं। सुमेश शर्मा, राजीव खेतान, प्रेम चुघ सहित अनेक लोग सहयोग करते हैं।

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