जनता ही चिल्लाएगी तो विधायकों-सांसदों को क्यों चुना गया
- नगर पालिका और पंचायतों के चुनाव सिर पर
- सियासी फायदे के लिए फिर आ गई नहरों में गंदे पानी की याद
श्रीगंगानगर। राजस्थान में अब नगर पालिका और पंचायत चुनाव सिर पर आ रहे हैं। इसी के साथ सियासतदानों को सियासी फायदे के लिए एक बार फिर नहरों में आ रहे गंदे-प्रदूषित पानी की याद आ गई है। पहले विधानसभा, फिर लोकसभा के लिए वोट मांग चुके लोग अब खुद के लिए जमीन तलाश रहे हैं। एक सुर में 'गंदा पानी-गंदा पानीÓ टर्राने लगे हैं। जनता से आह्वान किया जा रहा है कि 'वह एकजुट होकर गंदे पानी की आपूर्ति के विरोध में सड़कों पर आ जाएं। नेता कह रहे हैं कि जब तक जनता सड़कों पर नहीं आएगी, इस समस्या का समाधान होना संभव नहीं है।Ó यानी, इस बार भी परीक्षा जनता को ही देनी है। वोट पक्के होंगे नेताओं के और सड़कों पर पसीना जनता को बहाना होगा। यही सब करना है तो जनता ने विधायकों-सांसदों को क्यों चुना है! वे किस काम आएंगे! उनके किए वादे कब पूरे होंगे!
नहरों मेंं पंजाब से गंदे पानी की आपूर्ति आज की समस्या नहीं है। ऐसा पिछले कई दशकों से चल रहा है। श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों मेंं फैल रहे कैंसर की जड़ इसी गंदे केमिकल युक्त पानी को माना जाता है मगर नेताओं ने आज तक कभी इस समस्या से लोगों को निजात दिलाने के लिए ईमानदाराना प्रयास नहीं किए। बोतलबंद पानी पीने के आदी नेताओं को इस समस्या की याद उस समय आती है, जब चुनाव आसन्न होते हैं।
पिछले साल गंदे पानी का मुद्दा किसी को याद नहीं था। दिसम्बर में जब विधानसभा चुनाव आए तो नेताओं ने इस मुद्दे को उछालना शुरू कर दिया। जो-जो लोग जीते, वे मुंह फेरकर बैठ गए। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं रहा कि जनता गंदा पानी पीए या फिर साफ पानी। इसके बाद आए लोकसभा चुनाव। लोकसभा चुनाव मेंं नेताओं ने गंदे पानी को बड़ा मुद्दा बनाया। इसके बाद सब कुछ पहले जैसा।
अब नगर पालिका और पंचायतों के चुनाव आ रहे हैं तो गंदे पानी का मुद्दा बोतल में से जिन्न की तरह निकल कर सामने आ गया है। नेता वार्ड-वार्ड, गली-गली जा कर लोगों को गंदे पानी की समस्या के विरोध में उठ खड़े होने का आह्वान कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब तक जनता नहीं जागेगी, इसी प्रकार गंदा पानी नहरों में आता रहेगा।
सवाल उठता है कि क्या सब कुछ करने का जिम्मा जनता पर ही है। अगर जनता ने ही सब कुछ करना है तो विधायकों को चुनकर विधानसभा मेंं और सांसदों को चुनकर लोकसभा मेंं भेजने का मतलब ही क्या है? जब उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल ही नहीं करना है, सरकार पर दबाव ही नहीं डालना है तो क्या विधायक और सांसद दवा की तरह घिसकर फोड़े पर लगाने के काम आएंगे?
पिछले पांच साल तक केन्द्र और राजस्थान मेंं भाजपा की सरकार रही। पंजाब मेंं भी अकाली दल-भाजपा सरकार थी। भाजपा के नुमायंदे चाहते तो कि पंजाब सरकार के साथ समन्वय बनाकर इस समस्या के समाधान के लिए कोशिश कर सकते थे लेकिन किसी ने ऐसा नहीं किया। और तो और, डेढ़ साल पहले पंजाब की बड़ी शुगर मिल का प्रदूषित और केमिकल युक्त पानी डालने का दुस्साहस भी भाजपा के राज मेंं ही किया गया।
दरअसल, गंदे पानी का मुद्दा राजनेताओं के लिए वोटों की फसल उगाने का सामान है। नेताओं को लगता है कि अगर नहरों मेंं गंदा पानी आना बंद हो गया तो वे वोट किस आधार पर मांगेंगे? जनता को नेताओं की असलियत को समझ लेना चाहिए। जो भी नेता नगर पालिका और पंचायत चुनाव मेंं प्रदूषित पानी के मुद्दे पर वोट मांगने आए, उससे जनता सवाल करे कि आपने पांच साल में इस समस्या के समाधान के लिए क्या किया?
- सियासी फायदे के लिए फिर आ गई नहरों में गंदे पानी की याद
श्रीगंगानगर। राजस्थान में अब नगर पालिका और पंचायत चुनाव सिर पर आ रहे हैं। इसी के साथ सियासतदानों को सियासी फायदे के लिए एक बार फिर नहरों में आ रहे गंदे-प्रदूषित पानी की याद आ गई है। पहले विधानसभा, फिर लोकसभा के लिए वोट मांग चुके लोग अब खुद के लिए जमीन तलाश रहे हैं। एक सुर में 'गंदा पानी-गंदा पानीÓ टर्राने लगे हैं। जनता से आह्वान किया जा रहा है कि 'वह एकजुट होकर गंदे पानी की आपूर्ति के विरोध में सड़कों पर आ जाएं। नेता कह रहे हैं कि जब तक जनता सड़कों पर नहीं आएगी, इस समस्या का समाधान होना संभव नहीं है।Ó यानी, इस बार भी परीक्षा जनता को ही देनी है। वोट पक्के होंगे नेताओं के और सड़कों पर पसीना जनता को बहाना होगा। यही सब करना है तो जनता ने विधायकों-सांसदों को क्यों चुना है! वे किस काम आएंगे! उनके किए वादे कब पूरे होंगे!
नहरों मेंं पंजाब से गंदे पानी की आपूर्ति आज की समस्या नहीं है। ऐसा पिछले कई दशकों से चल रहा है। श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों मेंं फैल रहे कैंसर की जड़ इसी गंदे केमिकल युक्त पानी को माना जाता है मगर नेताओं ने आज तक कभी इस समस्या से लोगों को निजात दिलाने के लिए ईमानदाराना प्रयास नहीं किए। बोतलबंद पानी पीने के आदी नेताओं को इस समस्या की याद उस समय आती है, जब चुनाव आसन्न होते हैं।
पिछले साल गंदे पानी का मुद्दा किसी को याद नहीं था। दिसम्बर में जब विधानसभा चुनाव आए तो नेताओं ने इस मुद्दे को उछालना शुरू कर दिया। जो-जो लोग जीते, वे मुंह फेरकर बैठ गए। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं रहा कि जनता गंदा पानी पीए या फिर साफ पानी। इसके बाद आए लोकसभा चुनाव। लोकसभा चुनाव मेंं नेताओं ने गंदे पानी को बड़ा मुद्दा बनाया। इसके बाद सब कुछ पहले जैसा।
अब नगर पालिका और पंचायतों के चुनाव आ रहे हैं तो गंदे पानी का मुद्दा बोतल में से जिन्न की तरह निकल कर सामने आ गया है। नेता वार्ड-वार्ड, गली-गली जा कर लोगों को गंदे पानी की समस्या के विरोध में उठ खड़े होने का आह्वान कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब तक जनता नहीं जागेगी, इसी प्रकार गंदा पानी नहरों में आता रहेगा।
सवाल उठता है कि क्या सब कुछ करने का जिम्मा जनता पर ही है। अगर जनता ने ही सब कुछ करना है तो विधायकों को चुनकर विधानसभा मेंं और सांसदों को चुनकर लोकसभा मेंं भेजने का मतलब ही क्या है? जब उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल ही नहीं करना है, सरकार पर दबाव ही नहीं डालना है तो क्या विधायक और सांसद दवा की तरह घिसकर फोड़े पर लगाने के काम आएंगे?
पिछले पांच साल तक केन्द्र और राजस्थान मेंं भाजपा की सरकार रही। पंजाब मेंं भी अकाली दल-भाजपा सरकार थी। भाजपा के नुमायंदे चाहते तो कि पंजाब सरकार के साथ समन्वय बनाकर इस समस्या के समाधान के लिए कोशिश कर सकते थे लेकिन किसी ने ऐसा नहीं किया। और तो और, डेढ़ साल पहले पंजाब की बड़ी शुगर मिल का प्रदूषित और केमिकल युक्त पानी डालने का दुस्साहस भी भाजपा के राज मेंं ही किया गया।
दरअसल, गंदे पानी का मुद्दा राजनेताओं के लिए वोटों की फसल उगाने का सामान है। नेताओं को लगता है कि अगर नहरों मेंं गंदा पानी आना बंद हो गया तो वे वोट किस आधार पर मांगेंगे? जनता को नेताओं की असलियत को समझ लेना चाहिए। जो भी नेता नगर पालिका और पंचायत चुनाव मेंं प्रदूषित पानी के मुद्दे पर वोट मांगने आए, उससे जनता सवाल करे कि आपने पांच साल में इस समस्या के समाधान के लिए क्या किया?

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