Breaking News

क्या मैंने सही किया?

(कल का शेष)
 दिल्ली में 14 नवंबर से हर साल प्रगति मैदान में बहुत बड़ा इंटरनेशनल ट्रेड फेयर लगता है। उस साल 'परिवर्तन  नाम की एक संस्था ने इस ट्रेड फेयर के बाहर बहुत बड़े-बड़े पोस्टर लगा दिए जिसमें लिखा गया था कि यदि किसी को इनकम टैक्स रिफंड संबंधी कोई शिकायत हो तो वह इस 'परिवर्तनÓ नाम की संस्था के पास अपनी अर्जी लिख सकते थे। परिवर्तन संस्था उनकी तरफ से इस काम को आयकर विभाग से करवाएगी। मेरी जानकारी के मुताबिक, जो कि मुझे बाद में ज्ञात हुई, इस संस्था के पीछे 'अरविंद केजरीवालÓ का हाथ था, जो कि उस समय आयकर विभाग में ही सहायक आयुक्त के पद पर कार्य कर रहे थे और कुछ दिन पूर्व तक संयोग से हम दोनों साथ ही कार्य कर रहे थे। अरविंद केजरीवाल एक बहुत ही सुधारवादी प्रकृति के व्यक्तित्व थे और चूंकि वे आयकर विभाग में काम कर रहे थे, तो सम्भवत: उनको वहीं से सफाई की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हो रही थी। और इसलिए आम जनता की तकलीफों को दूर करने के लिए सबसे पहले उन्होंने आयकर विभाग को ही चुना। परंतु नतीजा यह हुआ कि उनके पास हजारों की संख्या में ऐसे आवेदन आ गए जहां लोगों को रिफंड नहीं मिले थे। शायद उनकी संख्या 50,000 रही होगी। कहना न होगा कि उनमें से लगभग 80 प्रतिशत आवेदन सम्भवत:  कर्मचारियों के थे। यानी कि लगभग 15 से 20 हजार ऐसे आवेदन उन सरकारी कर्मचारियों के थे, जिनको रिफंड नहीं मिले थे और जिनका रेंज प्रभारी मैं स्वयं था। जब इतनी बड़ी मात्रा में आवेदन आ गए और उन्होंने आयकर विभाग को आवेदन पहुंचाए तो पूरे विभाग में दिल्ली में हड़कंप मच गया। संसद में प्रश्न उठने लगे। हाई कोर्ट में पीआईएल फाइल कर दी गई और मीडिया के अंदर यह एक चर्चा का विषय बन गया। तीन-चार दिन के अंदर ही मानो दिल्ली में पूरे विभाग में अफरा-तफरी मची हुई थी।
दिल्ली के चीफ कमिश्नर कभी हाईकोर्ट में तो कभी पार्लियामेंट हाउस में, मंत्री जी के कार्यालय के तो कभी चेयरमैन के कार्यालय के चक्कर लगा रहे थे। उनको कई जगह उत्तर भी देते हुए नहीं बन पा रहा था क्योंकि यह स्थिति तो वास्तविक थी और लोगों को कठिनाई तो थी ही। चीफ कमिश्नर राजनारायण ने मुझे बुलाया और बताया कि किस प्रकार से मेरी रेंज से संबंधित इतनी अधिक शिकायतें आई हुई हैं।
 जब मैंने पिछले 15 दिनों में मेरे कार्यभार लेने के तुरंत बाद जो कार्यवाही की थी और पहले 'आओ पहले पाओÓ के आधार पर जो व्यवस्था निर्धारित की थी, उसके लिए जारी सर्कुलर और उसके मुताबिक ईशू किए गए, रिफंड की संख्या दिखानी शुरू की और पूरी व्यवस्था से उनको अवगत कराया तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा कि, 'के.सी., आज तो तू ने बचा लिया।Ó वे मेरे उस सर्कुलर को लेकर पार्लियामेंट हाउस भी गए और हाई कोर्ट में भी पीआईएल के जवाब में यही लिखा गया कि कोई भी अनियमितता रिफंड ईशु करने में नहीं है और जहां पर भी आउट ऑफ टर्न रिफंड दिया जाता है, वह एक उच्च अधिकारी की स्वीकृति से ही किया जाता है। मेरे जारी किए सर्कुलर को भी वहां हाईकोर्ट में दिखाया गया। उसको देखते हुए हाईकोर्ट ने संभवत पीआईएल को खारिज कर दिया था।
इसी प्रकार से पार्लियामेंट ह्नह्वद्गह्यह्लद्बशठ्ठ के जवाब में भी मेरे सर्कूलर को दिखा कर यह कहा गया कि रिफंड ईशु करने का काम बहुत ही व्यवस्थित रूप से किया जा रहा है। यूं कहना चाहिए कि इस सारी व्यवस्था को देखकर मंत्री भी प्रसन्न हुए और चीफ कमिश्नर ने भी राहत की सांस ली। उसके कुछ दिन बाद ही मेरे जो आयकर अधिकारी थे, उनमें से एक अधिकारी का तबादला हो गया और एक नए अधिकारी ने, जो कि महिला थी, ज्वाइन किया। वे मेरे पास यह शिकायत लेकर आई कि उनका अधीनस्थ कर्मचारी इस बात का आग्रह कर रहा है कि जब तक उनके सुझाए गए तीन-चार रिफंड के केस वह मेरे से स्वीकृत करवा कर नहीं लाएंगी, तब तक वह निर्धारित कोटा के 300-400 रिफंड ईशू नहीं करेगा। वे इस बात से बहुत नाराज थी कि वह कर्मचारी उनको ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा था और गलत दबाव बना रहा था। मैंने  उनसे कहा कि सम्भवत: जो व्यवस्था हम लोगों ने की थी, उसके मुताबिक वे अधिकारी गलत थी और कर्मचारी सही था। फिर मैंने, क्यों हमने इस प्रकार की व्यवस्था की थी, यह सारी बात उनके सामने स्पष्ट की। जब उनके  सामने सारी स्थिति स्पष्ट हो गई तो वे कहने लगी कि हां सर, यथास्थिति तो यही है और इसी तरीके से हम अपने अधीनस्थ कर्मचारी से काम करवा सकते हैं। अत: वह प्रसन्न होकर के चली गई और उन्होंने अपने वार्ड की स्थिति को भी संभाल लिया।
कहना न होगा कि अगले तीन-चार महीने में मेरे पास रिफंड के लिए आने वाली रिक्वेस्ट की संख्या लगभग नगण्य हो गई थी और अब कम से कम में रिफंड की रिक्वेस्ट के लिए वीआईपी व्यक्तियों की श्रेणी में नहीं आ रहा था। मुझे उसका कोई कष्ट नहीं था, क्योंकि लोगों के प्रश्नों का समाधान हो गया था और अगले छह महीने के भीतर तो कोई रिफंड बाकी ही नहीं बचा था। उसके अगले साल से तो, जैसा कि हमने पहले से सोचा था, हमने  प्रारंभ से ही  'पहले आओ पहले पाओÓ के आधार पर रिफंड ईशू करने में कोई कठिनाई नहीं थी।
 मैं यहां यह भी कहना चाहूंगा कि जिस प्रकार से सरकारी कर्मचारियों के लिए एक अलग रेंज रही थी, उसी प्रकार प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए भी अलग रेंज थी और वहां भी रिफंड के लिए इसी प्रकार की कठिनाई का सामना करना पड़ता था। वास्तव में प्राइवेट सेक्टर वालों को कठिनाई अधिक थी, क्योंकि वहां पर किसी प्रकार का सरकारी भय अथवा दबाव नहीं था। परंतु मेरी रेंज में परिवर्तन होने के बावजूद दूसरी रेंज में किसी प्रकार का परिवर्तन करना वहां के अधिकारियों ने उचित नहीं समझा। वह शायद इस तरह की बिन बुलाए मुसीबत को अपने गले नहीं बांधना चाहते थे। मेरे उस वक्त के आयकर आयुक्त को जब यह पता लगा तो उन्होंने मुझे शुरू में ही स्पष्ट शब्दों में बता दिया था कि यह सब मैं जो कर रहा था, इसका सारा दायित्व मेरे सिर ही होगा, जिस बात को मैं बहुत पहले से ही जानता था  बिना उनके बताए। परंतु जो एक पुरानी आदत थी, जिससे मजबूर होकर मैं यह सारे काम करता था, उसने मुझे पीछे नहीं हटने दिया । कई बार यह प्रश्न मैं अपने आप से पूछ लिया करता हूं, कि अधीनस्थ कर्मचारियों की यह तीन-चार केस की रिफंड की नाजायज मांग को मान कर क्या मैंने सही किया?
-केसी जैन, आईआरएस
निदेशक, अध्यात्म साधना केंद्र, दिल्ली

No comments