पिता धर्मेन्द्र की राह पर चल निकला बेटा सन्नी देओल
- जो कुछ बीकानेर वालों ने झेला, अब उसके लिए गुरदासपुर वालों की बारी
श्रीगंगानगर। जिन उम्मीदों और आशाओं के साथ बीकानेर संसदीय क्षेत्र के लोगों ने फिल्म स्टार धर्मेन्द्र को भारी-भरकम वोटों से जिताकर लोकसभा में भेजा था, वैसी ही उम्मीदों और आशाओं के साथ गुरदासपुर संसदीय क्षेत्र के लोगों ने धर्मेन्द्र के बेटे सन्नी देओल को एमपी बनाया है। सन्नी देओल ने एक कदम ऐसा उठाया है, जिससे साफ हो गया है कि उनके पास गुरदासपुर की जनता के लिए समय नहीं है। वे फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में खोए रहेंगे।
सन्नी देओल ने गुरदासपुर लोकसभा क्षेत्र में अपना एक 'सांसद प्रतिनिधिÓ नियुक्त कर दिया है।
सन्नी देओल ने गुरप्रीत सिंह पलहेरी नामक लेखक को अपना सांसद प्रतिनिधि नियुक्त कर उन्हें अपनी ओर से सरकारी बैठकों, कार्यक्रमों आदि में शिरकत करने का अधिकार दिया है। सन्नी देओल ने इसके लिए बाकायदा एक पत्र जारी किया है। इसमें गुरप्रीत सिंह को सांसद प्रतिनिधि नियुक्त करने का उल्लेख है। सन्नी देओल ने यह नियुक्ति स्थानीय मुद्दों पर पैरवी करने के लिए की है।
हालांकि गुरप्रीत सिंह ने मीडिया को बताया है कि सन्नी देओल प्रत्येक महीने गुरदासपुर का दौर कर जनता के बीच रहेंगे लेकिन सांसद प्रतिनिधि नियुक्त होने के बाद उनका विरोध शुरू हो गया है।
जो विरोधी सुर अलाप रहे हैं, उनका कहना है कि सन्नी देओल को 'सांसद प्रतिनिधिÓ नियुक्त करने का कोई अधिकार नहीं है। जनता ने सन्नी देओल को वोट देकर चुना है, उनके किसी प्रतिनिधि को नहीं चुना है। सन्नी देओल ने अपना प्रतिनिधि नियुक्त करके जनता के साथ धोखा किया है।
हो सकता है सन्नी देओल ने अपने सहायक के रूप में गुरप्रीत सिंह को जिम्मेदारी दी हो। इस तरह के प्रतिनिधि हर सांसद नियुक्त करता है। ऐसा प्रतिनिधि इसलिए जरूरी है क्योंकि जब सांसद निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद न हो, तब जनता इस प्रतिनिधि से संपर्क कर सके। लेकिन जिस तरह सन्नी देओल ने 'सांसद प्रतिनिधिÓ नामक पद पर गुरप्रीत सिंह को नियुक्ति देने का बाकायदा नियुक्ति पत्र जारी किया है, उसने सन्नी देओल की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सांसद निर्वाचित होते ही सन्नी देओल मनाली की वादियों में जाकर बैठ गए थे। तब उन्हें आलोचना सहनी पड़ी थी। अब उन्होंने 'सांसद प्रतिनिधिÓ नियुक्त करके लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सन्नी देओल इलाके के लोगों के संपर्क में रहने वाले नहीं हैं।
सच्चाई तो यह है कि गुरदासपुर से मुम्बई के बीच बहुत लंबा फासला है। एक तो यह फासला, दूसरी सन्नी देओल की फिल्मी दुनिया में व्यस्तता, इससे नहीं लगता कि सन्नी एक सांसद के रूप में जनता के प्रति अपना दायित्व सही तरीके से निभा पाएंगे।
सन्नी देओल के पिता धर्मेन्द्र से भी बीकानेर संसदीय क्षेत्र के लोगों को ऐसे ही कड़वे अनुभव हासिल हुए हैं। धर्मेन्द्र को लोगों को जिता तो दिया लेकिन जीतने के बाद जिस तरह धर्मेन्द्र ने मुंह फेरा, वह लोगों को भुलाए नहीं भूलता। जिस प्रकार सन्नी ने गुरदासपुर मेंं किसी गुरप्रीत सिंह को अपना प्रतिनिधि बनाया है, वैसे ही धर्मेन्द्र ने बीकानेर में किसी उम्मेद सिंह को सर्वेसर्वा बना दिया था। समझ में नहीं आता कि जब इन बड़े लोगों के पास जनता के लिए समय ही नहीं तो भला वे क्यों चुनाव लड़ते हैं? जब किसी काम से न्याय ही नहीं कर सकते तो किसलिए उसमें हाथ डालते हैं?
केवल फिल्म स्टार ही नहीं, बड़े उद्योगपति आदि से भी जनता को ऐसे ही अनुभव होते आए हैं। जनता को ऐसे लोगों को चुनकर हमेशा पछताना ही पड़ा है। सन्नी देओल को चुनकर अगर गुरदासपुर की जनता को पछताना पड़ता है तो इसके लिए सन्नी से ज्यादा जनता को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि जनता ने चुनाव के समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। जनता को वोट देते समय चिंतन करना चाहिए था कि फिल्म में दिखाई देने वाला 'ढाई किलो का हाथÓ उनके किसी काम भी आएगा या नहीं?
श्रीगंगानगर। जिन उम्मीदों और आशाओं के साथ बीकानेर संसदीय क्षेत्र के लोगों ने फिल्म स्टार धर्मेन्द्र को भारी-भरकम वोटों से जिताकर लोकसभा में भेजा था, वैसी ही उम्मीदों और आशाओं के साथ गुरदासपुर संसदीय क्षेत्र के लोगों ने धर्मेन्द्र के बेटे सन्नी देओल को एमपी बनाया है। सन्नी देओल ने एक कदम ऐसा उठाया है, जिससे साफ हो गया है कि उनके पास गुरदासपुर की जनता के लिए समय नहीं है। वे फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में खोए रहेंगे।
सन्नी देओल ने गुरदासपुर लोकसभा क्षेत्र में अपना एक 'सांसद प्रतिनिधिÓ नियुक्त कर दिया है।
सन्नी देओल ने गुरप्रीत सिंह पलहेरी नामक लेखक को अपना सांसद प्रतिनिधि नियुक्त कर उन्हें अपनी ओर से सरकारी बैठकों, कार्यक्रमों आदि में शिरकत करने का अधिकार दिया है। सन्नी देओल ने इसके लिए बाकायदा एक पत्र जारी किया है। इसमें गुरप्रीत सिंह को सांसद प्रतिनिधि नियुक्त करने का उल्लेख है। सन्नी देओल ने यह नियुक्ति स्थानीय मुद्दों पर पैरवी करने के लिए की है।
हालांकि गुरप्रीत सिंह ने मीडिया को बताया है कि सन्नी देओल प्रत्येक महीने गुरदासपुर का दौर कर जनता के बीच रहेंगे लेकिन सांसद प्रतिनिधि नियुक्त होने के बाद उनका विरोध शुरू हो गया है।
जो विरोधी सुर अलाप रहे हैं, उनका कहना है कि सन्नी देओल को 'सांसद प्रतिनिधिÓ नियुक्त करने का कोई अधिकार नहीं है। जनता ने सन्नी देओल को वोट देकर चुना है, उनके किसी प्रतिनिधि को नहीं चुना है। सन्नी देओल ने अपना प्रतिनिधि नियुक्त करके जनता के साथ धोखा किया है।
हो सकता है सन्नी देओल ने अपने सहायक के रूप में गुरप्रीत सिंह को जिम्मेदारी दी हो। इस तरह के प्रतिनिधि हर सांसद नियुक्त करता है। ऐसा प्रतिनिधि इसलिए जरूरी है क्योंकि जब सांसद निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद न हो, तब जनता इस प्रतिनिधि से संपर्क कर सके। लेकिन जिस तरह सन्नी देओल ने 'सांसद प्रतिनिधिÓ नामक पद पर गुरप्रीत सिंह को नियुक्ति देने का बाकायदा नियुक्ति पत्र जारी किया है, उसने सन्नी देओल की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सांसद निर्वाचित होते ही सन्नी देओल मनाली की वादियों में जाकर बैठ गए थे। तब उन्हें आलोचना सहनी पड़ी थी। अब उन्होंने 'सांसद प्रतिनिधिÓ नियुक्त करके लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सन्नी देओल इलाके के लोगों के संपर्क में रहने वाले नहीं हैं।
सच्चाई तो यह है कि गुरदासपुर से मुम्बई के बीच बहुत लंबा फासला है। एक तो यह फासला, दूसरी सन्नी देओल की फिल्मी दुनिया में व्यस्तता, इससे नहीं लगता कि सन्नी एक सांसद के रूप में जनता के प्रति अपना दायित्व सही तरीके से निभा पाएंगे।
सन्नी देओल के पिता धर्मेन्द्र से भी बीकानेर संसदीय क्षेत्र के लोगों को ऐसे ही कड़वे अनुभव हासिल हुए हैं। धर्मेन्द्र को लोगों को जिता तो दिया लेकिन जीतने के बाद जिस तरह धर्मेन्द्र ने मुंह फेरा, वह लोगों को भुलाए नहीं भूलता। जिस प्रकार सन्नी ने गुरदासपुर मेंं किसी गुरप्रीत सिंह को अपना प्रतिनिधि बनाया है, वैसे ही धर्मेन्द्र ने बीकानेर में किसी उम्मेद सिंह को सर्वेसर्वा बना दिया था। समझ में नहीं आता कि जब इन बड़े लोगों के पास जनता के लिए समय ही नहीं तो भला वे क्यों चुनाव लड़ते हैं? जब किसी काम से न्याय ही नहीं कर सकते तो किसलिए उसमें हाथ डालते हैं?
केवल फिल्म स्टार ही नहीं, बड़े उद्योगपति आदि से भी जनता को ऐसे ही अनुभव होते आए हैं। जनता को ऐसे लोगों को चुनकर हमेशा पछताना ही पड़ा है। सन्नी देओल को चुनकर अगर गुरदासपुर की जनता को पछताना पड़ता है तो इसके लिए सन्नी से ज्यादा जनता को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि जनता ने चुनाव के समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। जनता को वोट देते समय चिंतन करना चाहिए था कि फिल्म में दिखाई देने वाला 'ढाई किलो का हाथÓ उनके किसी काम भी आएगा या नहीं?

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