निर्जला एकादशी 13 जून को, व्रत करने वाले नहीं पिएंगे पानी की घूंट
- चलेगा दान-पुण्य का दौर, लगेंगी मीठे पानी, शर्बत की छबीलें
श्रीगंगानगर। निर्जला एकादशी 13 जून गुरुवार को जिले भर में बड़ी धूमधाम और श्रद्धा से मनाई जाएगी। इस दिन लोग विशेष पूजा अर्चना करेंगे, व्रत रखेंगे और दान पुण्य का दौर चलेगा। इस दिन मीठे पानी, शर्बत आदि की छबीलें विशेष रूप से लगाई जाएंगी। मंदिरों में विशेष कार्यक्रम होंगे।
पंडित सत्यपाल पाराशर ने बताया कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पडऩे वाली एकादशी को ही निर्जला एकादशी कहते हैं। एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाले को सभी एकादशियों का फल मिलता है। इसलिए इस एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। निर्जला एकादशी व्रत करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।
उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी के व्रत में जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं की जाती । महाभारत काल के दौरान पांडू पुत्र भीम ने स्वर्ग की इच्छा से इस व्रत को रखा था। जिसकी वजह से निर्जला एकादशी के व्रत को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे बड़ा स्थान दिया गया है । एकदशी में मुख्य रूप में भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है। प्रत्येक साल में 24 एकादशियां आती हैं। इन्हीं में से एक निर्जला एकादशी भी होती है। विष्णु पुराण में एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है।
पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पता। वह सिर्फ निर्जला एकादशी का ही व्रत कर ले तो उसे सभी एकादशियों का फल मिल जाएगा। साल की सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी का पुण्य फल कई गुना है।
यह है निर्जला एकादशी व्रत की कथा
निर्जला एकादशी से संबंधित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में दूसरे भाई भीमसेन खाने-पीने के अत्यधिक शौकीन थे। अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं थे इस कारण वे एकादशी व्रत को नहीं कर पाते थे। भीम के अलावा बाकी पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान थे। भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गये। तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। जिसके बाद भीम ने निर्जला एकादशी का पूरे विधि-विधान से व्रत किया। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।
श्रीगंगानगर। निर्जला एकादशी 13 जून गुरुवार को जिले भर में बड़ी धूमधाम और श्रद्धा से मनाई जाएगी। इस दिन लोग विशेष पूजा अर्चना करेंगे, व्रत रखेंगे और दान पुण्य का दौर चलेगा। इस दिन मीठे पानी, शर्बत आदि की छबीलें विशेष रूप से लगाई जाएंगी। मंदिरों में विशेष कार्यक्रम होंगे।
पंडित सत्यपाल पाराशर ने बताया कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पडऩे वाली एकादशी को ही निर्जला एकादशी कहते हैं। एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाले को सभी एकादशियों का फल मिलता है। इसलिए इस एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। निर्जला एकादशी व्रत करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।
उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी के व्रत में जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं की जाती । महाभारत काल के दौरान पांडू पुत्र भीम ने स्वर्ग की इच्छा से इस व्रत को रखा था। जिसकी वजह से निर्जला एकादशी के व्रत को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे बड़ा स्थान दिया गया है । एकदशी में मुख्य रूप में भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है। प्रत्येक साल में 24 एकादशियां आती हैं। इन्हीं में से एक निर्जला एकादशी भी होती है। विष्णु पुराण में एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है।
पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पता। वह सिर्फ निर्जला एकादशी का ही व्रत कर ले तो उसे सभी एकादशियों का फल मिल जाएगा। साल की सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी का पुण्य फल कई गुना है।
यह है निर्जला एकादशी व्रत की कथा
निर्जला एकादशी से संबंधित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में दूसरे भाई भीमसेन खाने-पीने के अत्यधिक शौकीन थे। अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं थे इस कारण वे एकादशी व्रत को नहीं कर पाते थे। भीम के अलावा बाकी पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान थे। भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गये। तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। जिसके बाद भीम ने निर्जला एकादशी का पूरे विधि-विधान से व्रत किया। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

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