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...और बन क्या गया, स्वयं समाज भाईचारा सम्मेलन

एक तीर से कईं निशाने साधने की कोशिशें
राजनीतिक लाभ मिलना मुश्किल

श्रीगंगानगर। रामलीला मैदान में भाजपा नेता प्रहलाद राय टाक का सर्वसमाज भाईचारा सम्मेलन स्वयं समाज भाईचारा सम्मेलन बनकर रह गया। टाक ने इस बहाने एक तीर से कईं निशाने साधने की कोशिश की। इससे कुछ लोग तो खुश हुए, लेकिन ज्यादातर उनके प्रतिद्वंदियों की श्रेणी में आकर खड़े हो गये। यानी चौबे जी, दुबे जी बनकर रह गए।
यह बात तो पूरे शहर को पता है कि प्रहलाद टाक को सबसे बड़ी उम्मीदें कुम्हार समाज से हैं। चर्चा यहां तक है कि समाज के लोगों को खुश करने के लिए टाक ने पिछले चुनाव से अब तक अनेक जतन किए। कई बार मीटिंगें हुईं। हर मीटिंग में एक बात जरूर उठती थी कि क्या गारण्टी है कि टाक चुनाव लड़ेंगे भी या नहीं? कल को पार्टी टिकट न दें, और टाक किसी को समर्थन देकर बैठ जाएं? ऐसे में समाज का क्या बंटेगा, क्योंकि अब तक होता भी यही आया था। चौधर की चाहत में कुम्हार समाज का वोट बैंक दिखाकर टिकट तो मांगी जाती रही है, लेकिन ऐन वक्त पर दावेदार 'ठण्डेÓ होकर बैठ जाते। न समाज का कुछ बंटता और न दावेदार का।
टाक बड़ी दुविधा में रहे इन सवालों पर। उन्होंने वक्त की नजाकत को समझा और वचन दिया कि अगर समाज साथ दे तो वे चुनाव मैदान से पीछे नहीं हटेंगे चाहे पार्टी टिकट दे या नहीं दे। चाहे निर्दलीय ही क्यों न लडऩा पड़े। बिरादरी के लोग (सभी नहीं) इस बात पर राजी हुए कि चलो ठीक है। पैसे वाला है, विधायक बनने के ख्वाब भी देख रहा है तो आजमाने को बुरा नहीं है, चाहे चुनाव जीते या हारे।
अब टाक ने समाज को तो यह वचन दे दिया, लेकिन उन्हें एक बात शुरू से ही पता थी कि अकेले कुम्हार समाज के दम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता, भले ही एक-एक बच्चा ही क्यों ना लग जाए और पार्टी भी इस बात पर टिकट नहीं देगी। क्योंकि यह बात राजनीति का हर खिलाड़ी जानता है कि टाक ने भले ही चुनाव हर हाल में लडऩे का वचन दिया हो लेकिन पार्टी के बिना जीत इतनी आसान नहीं।
शहर के लोग इस बात को भूले नहीं कि बहुसंख्यक होने के बावजूद राधेश्याम गंगानगर जैसे नेता भी अकेले अरोड़ा समाज के दम पर चुनाव जीतने का ख्वाब नहीं देखते। वे जब 36 बिरादरी की बात करते हैं तो इसके पीछे यही वजह होती है।
खैर अपना दम-खम दिखाने के लिए टाक और उनके रणनीतिककारों ने सर्व समाज भाईचारा सम्मेलन की व्यूह रचना की। खूब पैसा बहाया गया। विधानसभा क्षेत्र से बाहर के लोगों को भी लाने की रणनीति बनी। टैम्पो, कार-जीप और अन्य वाहनों से लोगों को लाने की योजना बनाकर रविवार को 'सर्व समाजÓ सम्मेलन का आयोजन करा दिया गया।
सबको दिख रहा था कौन लोग, कहां से आए हैं, किस बिरादरी से हैं। कितनी संख्या में हैं। किसी कम्पनी को लांच कर करने की मार्केटिंग की तरह टाक को लांच करने की जी-तोड़ कोशिशें की गई। जिन लोगों ने भीड़ को बढ़ा-चढ़ाकर बताया, उनको आगे और जो हकीकत के करीब बता रहे थे उनको पीछे धकेल दिया गया।
श्रीगंगानगर शहर से पार्टी का कोई ढंग का नेता नहीं दिखा। ना व्यापारी, ना नेता और ना शहर का कोई ऐसा चेहरा जिसको कहा जा सके कि यह श्रीगंगानगर विधानसभा का है। तेजी से लाइम लाइट में आया एक चेहरा था। राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त पंजाबी भाषा एकेडमी के अध्यक्ष रवि सेतिया।
अब बात करते हैं जिला प्रगतिशील कुम्हार समिति की। समिति के अध्यक्ष हैं सुभाष माहर। प्रहलाद टाक इनसे पूर्व इस पद पर विराजमान थे। सबको याद होगा जब टाक इस पद पर थे, तब उनकी पहचान कुम्हार समाज के नेता के रूप में शुरू हुई थी।
अब वही समिति है जिसके अध्यक्ष सुभाष माहर हैं। माहर ने एक प्रैस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि भले ही टाक इसे सम्मेलन को अपनी उपलब्धि माने लेकिन कुम्हार समाज उनकी खिलाफत में उतर आया है। माहर ने टाक के सम्मेलन को नौटंकी बताया। उन्होंने कहा कि अबोहर-फाजिल्का, सूरतगढ़, अनूपगढ़, घड़साना, हनुमानगढ़ आदि से लाए गए लोग यह तय नहीं करेंगे कि श्रीगंगानगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक कौन होगा।
इसके अलावा कुम्हार समाज से वास्ते रखने वाले पूर्व पार्षद बाल कृष्ण कुलचानिया और पार्षद पुष्पा कुलचानियां भी टाक के विचारों से सहमत नहीं हैं।
यहां बात करते हैं शहर से भाजपा टिकट के दावेदार यूआईटी अध्यक्ष संजय महिपाल, अजय ८ शेष ञ्च 5 पर
चांडक और कामिनी जिंदल की। सम्मेलन में टाक ने तीनों को निशाने पर लेते हुए फेल जनप्रतिनिधि करार दिया। यहां वे यह बात भूल जाते हैं कि जिस पार्टी के वे जिला उपाध्यक्ष है उसी पार्टी की ही राज्य में सरकार है और उसी पार्टी से न्यास अध्यक्ष महिपाल हैं। पिछले साढ़े चार साल में वे जनहितैषी रहें हैं तो पार्टी के पदाधिकारी भी रहे हैं। उनका नैतिक दायित्व बनता था कि वे पद से इस्तीफा दे सड़कों पर उतरते।
सवाल यह है कि सम्मेलन के बहाने एक तीर से कई शिकार करने की मंशा रखने वाले टाक अपने प्रतिद्वंदियों को पीछे धकेलना तो चाहते ही हैं, साथ ही जनता की सहानुभूति बटोरते हुए भाजपा और सरकार को यह संदेश भी देने की कोशिश भी कर रहे हैं कि अगर उन्हें तवज्जो नहीं दी तो वे बगावत पर भी उतर सकते हैं। वे दिल से कतई नहीं चाहते कि उन्हें निर्दलीय चुनाव लडऩा पड़े। क्योंकि आज की तारीख में वह रास्ता बड़ा दुर्गम, कंटीला और मुश्किलों भरा है।
भाजपा में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों ने तो कहना शुरू कर दिया, पार्टी जिसको टिकट देगी उसके साथ हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन्हीं दिनों में यह बात दोहरा चुके हैं कि पार्टी में किसी भी 'पैराशूटीÓ को टिकट नहीं दी जाएगी। इन हालातों में भाजपा से बगावत करके या कांग्रेस को तुरन्त ज्वॉइन करके कोई नेता कांग्रेस से चुनाव नहीं लड़ सकता।
रविवार को टाक का सम्मेलन तो सम्पन्न हो गया, लेकिन इसमें सर्व समाज कहीं नजर नहीं आया। शहर के लोग तो नदारद ही थे। ऐसी स्थिति में लगता नहीं कि सरकार या भाजपा किसी तरह के दबाव में जाएगी। अब तक टाक जिन भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं के साथ रहते आए हैं, उनमें दरार जरूर आ गई हैं। बगावत के सुर से अब वो बात नहीं रहेगी, जो रविवार से पूर्व थी। भाजपा टिकट के दावेदारों को टाक का विरोध और खिलाफत करने का मौका मिल गया है।

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