गेमजॉन और ट्रेम्पोलिन पार्क गेम नहीं खतरों से खाली
- बच्चे जिद कर बिगाड़ रहे मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट
श्रीगंगानगर। शहर की एक नवविकसित पॉश कॉलोनी। कॉलोनी के बाजार में बना गेमजॉन। 5-6 साल का एक बच्चा जमीन पर पसरा रोए जा रहा है। उसके परिजन उसे उठाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह लगातार पछाड़ खाकर खुद ही गिर रहा है। उसे देखने के लिए कुछ लोग खड़े हैं। पूछते हैं बच्चा रो क्यों रहा है।
परिजन बता रहे हैं कुछ नहीं जी, यूं ही गेम खेलने के लिए जिद कर रहा है। पास में खड़े लोग आपस में बतियाते हैं। कैसे मां-बाप हैं। बच्चे की इच्छा पूरी नहीं कर पा रहे। बच्चे का पिता उन लोगों की मंशा समझ जाता है और एक गेम चलवा देता है। पांच मिनट का गेम चलवाने में 150 रुपए लगते हैं। बच्चे के मां-बाप शर्मसार हो रहे हैं, लेकिन बच्चे पर कोई असर नहीं, गेम खत्म होते ही उसकी जिद फिर शुरू हो जाती है।
ये वह कॉलोनियों है जो हनुमानगढ़ और सूरतगढ़ मार्ग पर हाल की विकसित हुई हैं। आजकल प्रतिस्पर्धा के चलते कॉलोनियों में भीड़भाड को आकर्षित करने के लिए बहुमंजिला इमारतों में गेमजॉन बनाए जा रहे हैं। एक ही छत के नीचे बच्चों-बड़ों के मनोरंजन के लिए विभिन्न तरह के कम्प्यूटराइड गेम, हॉरर शो, स्किल गेम स्थापित किए गए हैं। बच्चों को यह गेम काफी आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन मध्यम वर्गीय परिवारों का बजट बिगड़ रहा है। बच्चे इधर-उधर से दोस्तों, रिश्तेदारों से बच्चों को सुनकर गेमजॉन में जाने की जिद करते हैं। मां-बाप बच्चों की जिद के आगे चल पड़ते हैं। यह सोचकर कि चलो एक बार घूम आते हैं और कुछ नहीं तो बच्चों को दिखा ही लाएंगे।
मां-बाप बच्चों को लेकर पहुंचते हैं, वहां पहले से ही कई बच्चे मस्ती करते, गेम खेलते नजर आते हैं। इन्हें देखकर बच्चे मचल उठते हैं। हमें भी चलाना है, खेलना है। मां-बाप रेट पूछते है। पता चलता है एक आईटम को चलाने के कम से कम 150-200 रुपए हैं। बच्चे एक गेम खेलने के बावजूद और गेम खेलने के लिए जिद पर जिद करते जाते हैं पर पापा का धैर्य जवाब दे जाता है। वह अपने पत्नी से घर जाने का बोलता है पर बच्चा रोने लगता है।
मम्मी-पापा बेबस हैं। बच्चे की इच्छा पूरी करे या अपना बजट देखे। सभी गेम को खेलने में 2-3 हजार लगते हैं।
परिवार का मुखिया चिंतित, कैसे खर्चा चलाएं
बाजारवाद के युग में मध्यम वर्गीय परिवारों की हालत खराब है। बजट बिगड़ रहा है। परिवार का मुखिया कैसे संतुलन बिठाए। बाजार में अनेक वस्तुएं, खाने-पीने का सामान, चकाचौंध उपलब्ध है। इनकी जरूरत नहीं, लेकिन लगातार बच्चों की मांग से तनाव बढ़ रहा है। बच्चों की जिद के आगे मां-बाप को शर्मसार होना पड़ता है। अनेक लोगों के बीच में कुछ बोल नहीं पाते।
गेम में रोमांचकारी कसरत पड़ सकती है महंगी
गेमजॉन या ट्रेम्पोलिन पार्क में अनेक तरह के गेम होते हैं। कुछ मनोरंजन करते हैं, तो कुछ को एक्सरसाइज का बताकर भ्रमित किया जा रहा है। एक्सरसाइज तो घूमने, फिरने, योग अभ्यास से भी हो सकती है, लेकिन इनमें सिर्फ एक बार की गई रोमांचकारी कसरत महंगी पड़ती है और खतरनाक भी होती है। उदयपुर में खुले एक ट्रेम्पोलिन पार्क में एक लडक़ी घायल हो गई। वह ऊंचाई से विशालकाय गुब्बारे पर बैठती है, तो दूसरा युवक उस विशाल गुब्बारे पर कूदता है। लड़की ऊछलते हुए अपना बैलेंस नहीं बना पाती। जोर से गिरने से उसके हाथ में फ्रैक्चर हो जाता है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
देखा-देखी बढ़ रहा खतरनाक चलन
गेमजॉन या ट्रेम्पोलिन पार्क पर भारी निवेश होता है। निवेश खर्च निकालने एवं कमाई करने के लिए संचालक मनमाने रेट वसूलते हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह अनावश्यक खर्च है तो पैसे वालों के लिए फन और इंटरटनमेंट। इनके संचालक बड़े गर्व से कहते हैं हमारे यहां जो गेम हैं, वैसा पूरे राजस्थान में नहीं है। लोगों में देखा-देखी अनावश्यक होड़ बढ़ रही है। बच्चे तो बच्चे युवा भी आकर्षित हो रहे हैं।
कॉलोनाइजरों के भवन में चल रहे ये गेम
नवस्थापित कॉलोनियों में बने गेम जॉन और ट्रेम्पोलिन पार्क कॉलोनाइजरों के भवन में चल रहे हैं। वे इनको किराए पर देेते हैं। कुछ किराया लेते हैं, तो एक निश्चित बुकिंग के बाद उनकी पार्टनरशिप भी तय है। विभिन्न परिवारों के बजट बिगाडऩे के लिए वे नए-नए फंडे ला रहे हैं। इनमें न तो बच्चों को कुछ हासिल हो रहा है और न ही नागरिकों को। हां उनकी जेब जरूर हल्की हो रही है।

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